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दर्द का सच

Posted On: 29 Feb, 2012 मेट्रो लाइफ में

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मैं जो कुछ कहने जा रहा हूँ वो एक स्याह सच है जिसे मेरी एक मित्र ने झेला है, या यों कहें कि उसने इस त्रासदी को जिया है. वो कश्मीर की रहने वाली है, वही कश्मीर जिसे इस धरती का स्वर्ग कहा जाता है, मगर स्वर्ग में उसने नर्क को देखा और जिया. उसके नर्क को मैं आप तक इस कविता के माध्यम से पहुंचा रहा हूँ. अगर इसे पढ़कर आप उस स्याह सच को महसूस कर सकें तो मैं समझूंगा कि आपकी संवेदना उसके साथ है.
……………………………………………………………………………………………………………………….
मीता
कुछ बात करो
अपने ग़मों के बादल से
अश्कों की बरसात करो
और
मैं चातक बन कर
तुम्हारे दर्द की बूंदों को
सहेज लूँगा अपने होठों पर
मीता
कुछ तो बात करो……..
…………………………………………
मीता
क्या बात करूँ
क्या याद करूँ
किससे जाकर फरियाद करूँ?
…………………………………………..
बस बारह बसंत देखे थे मैंने
हिरनी-सी कुलांचे भरती
वन-उपवन,घर आँगन देहरी
मस्ती छाई रहती थी
फिर
फिर वो दिन आया
सूरज पर काली छाया
अचानक कहीं बन्दूक चली
चीख-पुकार की कोहराम मची
भैया,पापा खून से लथपथ
सीने से भींचकर मम्मी मुझे
काँप रही थी थरथर-थरथर
यकायक माँ भी गिर गयी
शायद गोली उसे भी लग गयी
फिर दो हाथों ने मुझे उठाया
……………………………………………………
रौंद दिया कली का बचपन
उजड़ चुका था एक चमन
एक भयावह सपने-सा सच
दिन-रात लिए मैं फिरती हूँ
याद न आये उन यादों की
इसलिए चुप मैं रहती हूँ
क्या बात करूँ
मीता
क्या बात करूँ
ग़मों के हिमखंड अडिग हैं
क्या बरसात करूँ
मीता, क्या बात करूँ.
…………………………………………
मेरे होठों पर शब्द नहीं
दिमाग संज्ञां-शून्य हुआ जाता है
सुनकर तुम्हारी दास्ताँ
दम घुटा जाता है
तुमने तो त्रासदी झेला है
तुम्हारे साथ ग़मों का मेला है.
मीता…..
फिर भी ज़िन्दगी जीना है
हर गम को पीना है
रात कितनी भी स्याह क्यों न हो
हर रात की सुबह होती है
ग़मों के मझधार से लड़े जो
वही काबिल
समंदर पार करके ही
बहादुर पाते हैं साहिल
मीता
तुम्हें उठना होगा
लड़ना होगा,जीना होगा
वो हिम्मत क्या
जो यूँ ही टूट जाये
वो पकड़ ही क्या
जो यूँ ही छूट जाये
ज़िन्दगी फिर बुलाती है तुम्हें
रूठी खुशियाँ फिर मनाती हैं तुम्हें
मीता
अब बोलो
कुछ बात करोगी……………….
……………………………………………………
हाँ! मीता
मैं बात करुँगी
ज़िन्दगी से दो-दो हाथ करुँगी
हार न मानूंगी मैं कभी
मीता
मैं बात करुँगी.

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11 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadhana thakur के द्वारा
February 29, 2012

क्या कहूं भाई ,दिल को झकझोरती सच्चाई को पेश करती रचना ……….

chandanrai के द्वारा
February 29, 2012

आपके शब्द प्राण की तरह है अपने मार्गदर्शन की की कृपा बनाये रखिये

    drmalayjha के द्वारा
    February 29, 2012

    चन्दन भाई, आपने कविता को महसूस किया, इसके लिए आपका धन्यवाद.

Tamanna के द्वारा
February 29, 2012

बेहद मार्मिक रचना…. आपकी दोस्त के साथ जो हुआ उसके बारे में सोचकर ही कंपन होने लगती है… इस रचना पर मैं ज्यादा कुछ कह नहीं पाउंगी… http://tamanna.jagranjunction.com/2012/02/27/marriage-customs-indian-marriages-and-change-of-name/

    drmalayjha के द्वारा
    February 29, 2012

    तमन्ना जी ,आपने उसकी त्रासदी को महसूस किया, मेरी रचना सार्थक हुई. आपका आभार.

sonam के द्वारा
February 29, 2012

जो भी आपकी मित्र के साथ हुआ बहुत गलत हुआ इस पर सिफॅ खेद परकट कर देना ही काफी नही है मेरे विचार से इसकी जिमेदार जाति नही है, धमॅ नही है इसका जिमेदार कोई है तो इंसान की इंसानियत, जो मर चुकी है। जैसा कि योगी सर ने कहा कि जो वादियाँ स्वर्ग सी लगती हैं , वहां का इतना घिनोना रूप देख कर / सुनकर /पढ़कर क्या महसूस करा जाये ? इस दर्द को जिसने झेला हो वाही जानता है की इस दर्द में कितनी लाचारी छुपी है | हम तो बस भगवान से यहीं दुआ करते है कि वह आपकी मित्र को इस दुख से लडने की हिममत दे। ओर अब जाग भी जाए कब तक यूं धरती मां को रोते देखते रहेगे, कब तक आतमा को लहुलूहान होते देखते रहेंगे, कब तक।

    drmalayjha के द्वारा
    February 29, 2012

    सोनम जी, ज़िन्दगी अद्भुत रंग दिखाती है. हँसता-खिलता संसार पल में दुखों के सुनामी में बह जाता है. फिर भी जीवन चलता रहता है. मेरी दोस्त के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. आज उसके पास सब कुछ है- एक अच्छा जॉब, एक प्यार करने वाला पति और एक प्यारा-सा बेटा और यादों के कुछ पल. शुक्रिया आपका कि आपने मेरी कविता में उसकी त्रासदी को महसूस किया.

yogi sarswat के द्वारा
February 29, 2012

डॉ साब , आपने अपनी मित्र ( उनके जैसी और भी ) की व्यथा जिस तरह से लिखी है , बस यही कह सकता हूँ की ………..बस क्या कहूं ! जो वादियाँ स्वर्ग सी लगती हैं , वहां का इतना घिनोना रूप देख कर / सुनकर /पढ़कर क्या महसूस करा जाये ? इस दर्द को जिसने झेला हो वाही जानता है की इस दर्द में कितनी लाचारी छुपी है | आपने उनकी व्यथा को शब्द दिए , बहुत बड़ी बात है ! आपका आशीर्वाद चाहता हूँ ! अगर समय मिले तो कृप्यअ अपने विचार दीजियेगा ! http://yogensaraswat.jagranjunction.com/2012/02/14

    drmalayjha के द्वारा
    February 29, 2012

    योगी सारस्वत जी, शायद ज़िन्दगी इसी का नाम है कभी हंसती-खिलखिलाती तो कभी रोटी-बिलखती. आपका आभार कि आपको मेरा प्रयास पसंद आया.

February 29, 2012

सादर नमस्कार! काश ऐसी अमानवीय घटनाओं को हम हिन्दू-मुस्लिम बनकर नहीं सोचतें तो यक़ीनन हम इससे कुछ सबक लेते क्योंकि कोई भी मारा जाएँ, हार तो मानवता की होती हैं…….सार्थक और सफल रचना के लिए बधाई.

    drmalayjha के द्वारा
    February 29, 2012

    अनिल जी, आपका आभार.


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